धर्मब्रेकिंग न्यूज़मथुरावृन्दावनसुधीर के बोल
सुधीर के बोल:- बीमार शरीर से आनन्दित होने की सम्भावना तो है पर बीमार आत्मा से आनन्दित नही हुआ जा सकता

- अगर मानव व पशु-पक्षी में तुलना की जाएं तो पशु-पक्षी अधिक आनंदित होंगे। आज जिसे हम विकास कहते है दरअसल वह विनाश है इसे आप ऐसे समझो कि एक व्यक्ति ने शानदार, आलीशान भव्य रहने के लिये महल बनाया जिसे बनाने के लिये उसे गुर्दे बेचने पड़े क्या वह स्वस्थ रह पाएगा उस महल का उपयोग कर पायेगा?
यही आज सारी दुनिया कर रही है, दुनिया के शासक से लेकर अंतिम व्यक्ति तक की यह सोच है कि बाहरी संसाधनों से हम आनन्दित हो जाएंगे। मनुष्य की रचना का मूल उद्देश्य क्या है उसे यह ज्ञात ही नही और जब तक उसे अपने जन्म के कारण के होने का कारण ज्ञात नही वह आनंदित नही हो पायेगा।
अगर कोई बीज वृक्ष न बन पाए तो दुखी होगा। अगर कोई सरिता सागर से न मिल पाए तो दुखी होगी। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मनुष्य जो वृक्ष बनने को है वह नहीं बन पाता है और जिस सागर से मिलने के लिए मनुष्य की आत्मा बेचैन है, उस सागर से भी नहीं मिल पाती है, इसीलिए मनुष्य दुख में हो?
धर्म मनुष्य को उस वृक्ष बनाने की कला का नाम है।
धर्म मनुष्य (आत्मा) को सागर (परमात्मा) से मिलाने की कला का नाम है–जिस सागर से मिल कर तृप्ति मिलती है, शांति मिलती है, आनंद मिलता है।
लेकिन धर्म के नाम पर जो जाल खड़ा हुआ है वह मनुष्य को कहीं ले जाता नहीं, और भटका देता है। धर्म के नाम पर कितने धर्म हैं दुनिया में? तीन सौ धर्म हैं दुनिया में! और धर्म तीन सौ कैसे हो सकते हैं? धर्म हो सकता है तो एक ही हो सकता है। सत्य अनेक कैसे हो सकते हैं? सत्य होगा तो एक ही होगा। लेकिन एक सत्य के नाम पर जब तीन सौ संप्रदाय खड़े हो जाते हैं, तो सत्य की खोज करनी भी मुश्किल हो जाती है।








