
मथुरा/वृंदावन। वृंदावन-जैत क्षेत्र में बेशकीमती जमीनों के कारोबार के बीच 1432 गज जमीन और ₹1.45 करोड़ के कथित सौदे ने अब पुलिस जांच का रूप ले लिया है। ग्राम हद नगला की खसरा संख्या 204 से जुड़े इस विवाद में तीर्थ चंद गर्ग की शिकायत पर थाना जैत में FIR संख्या 0627/2026 दर्ज की गई है। FIR में भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), 338, 336(3) और 340(2) लगाई गई हैं।
विवाद के केंद्र में बिल्डर बालमुकुंद शर्मा
FIR में दर्ज शिकायत के अनुसार तीर्थ चंद गर्ग अपने भतीजे चेतन गर्ग के साथ वृंदावन में आवासीय जमीन खरीदना चाहते थे। शिकायत में कहा गया है कि इसी सिलसिले में उनकी मुलाकात बालमुकुंद शर्मा से हुई, जिन्होंने कथित रूप से उन्हें जमीन दिखाने और सौदा कराने की बात कही।
शिकायत के मुताबिक इसके बाद बालमुकुंद शर्मा के माध्यम से उनकी मुलाकात कपिल जग्गी और कृष्ण कुमार खंडेलवाल से कराई गई। FIR में बालमुकुंद शर्मा समेत पांच लोगों को नामजद किया गया है।
1432 गज के नाम पर ₹1.45 करोड़!
शिकायतकर्ता के अनुसार जिस जमीन का सौदा कराया गया, उसे खसरा संख्या 204 की भूमि बताया गया था। FIR में संबंधित भूखंड का क्षेत्रफल 0.11973 हेक्टेयर दर्ज है।
शिकायत के अनुसार 10 जून 2024 को कृष्ण कुमार खंडेलवाल और कपिल जग्गी से बैनामा कराया गया तथा ₹1.45 करोड़ RTGS के जरिए भुगतान किए गए। FIR में योगेंद्रपाल खंडेलवाल को इस लेन-देन का गवाह बताए जाने का भी उल्लेख है।
लेकिन असली विवाद तब सामने आया जब खरीदार जमीन पर निर्माण कराने पहुंचा।
जमीन पर पहुंचे तो पड़ोसी पट्टेदार ने खड़ा कर दिया सवाल
FIR के अनुसार 4 अप्रैल 2025 को तीर्थ चंद गर्ग और उनके भतीजे मजदूरों के साथ जमीन पर निर्माण कराने पहुंचे। इसी दौरान खसरा संख्या 213 के पट्टेदार कैलाशपति पुत्र बुद्धाराम आदि द्वारा आपत्ति किए जाने की बात शिकायत में कही गई है।
शिकायत के अनुसार मौके पर बताया गया कि जिस जमीन को खसरा 204 की जमीन बताकर सौदा किया गया था, वह खसरा 204 में नहीं बल्कि खसरा संख्या 208 और 213 से संबंधित भूमि का हिस्सा हो सकती है।
यहीं से ₹1.45 करोड़ के सौदे की पूरी कहानी खसरा नंबरों की उलझन में फंस गई।
मामले से संबंधित उपलब्ध दस्तावेज में एक हस्तलिखित स्थल-नक्शा भी सामने आया है। इसमें खसरा संख्या 204 के साथ उसके आसपास 208 और 213 का उल्लेख किया गया है। नक्शे में मौके पर मौजूद विभिन्न निर्माण/कमरों तथा सीमाओं को भी अंकित किया गया है।
दस्तावेज के नीचे 01 अगस्त 2026 की तारीख के साथ शिवपाल सिंह, अमीन ग्रेड-1, सिविल कोर्ट, मथुरा का नाम एवं हस्ताक्षर दिखाई देते हैं।
यह दस्तावेज इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि विवाद का मूल प्रश्न ही मौके की वास्तविक स्थिति और राजस्व अभिलेखों में दर्ज खसरा सीमाओं को लेकर है।
बैनामा कुछ कहता है, जमीन पर स्थिति कुछ और?
शिकायतकर्ता का आरोप है कि बाद में बैनामा और राजस्व अभिलेखों की जांच करने पर उन्हें कथित रूप से पता चला कि बैनामे में दर्शाई गई दिशाएं और मौके की स्थिति में अंतर है। FIR में यह भी आरोप लगाया गया है कि संबंधित भूखंड खसरा 204 में शामिल नहीं था।
यदि राजस्व रिकॉर्ड, नक्शा और मौके का सीमांकन अलग-अलग स्थिति दिखाते हैं, तो यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु होगा कि बैनामा तैयार करते समय जमीन की पहचान किस दस्तावेज और किस आधार पर की गई थी।
अब पुलिस जांच में बालमुकुंद शर्मा की भूमिका भी अहम
इस पूरे मामले में बालमुकुंद शर्मा की भूमिका जांच का एक प्रमुख पहलू बनती है, क्योंकि शिकायतकर्ता के कथन के अनुसार जमीन खरीदने के इच्छुक व्यक्ति की मुलाकात संबंधित विक्रेताओं से कराने और भूखंड दिखाने की शुरुआत उनसे जुड़ी थी।
अब जांच में यह सामने आना बाकी है कि:
किसने जमीन दिखाई?
किसने खसरा 204 बताया?
1432 गज की जमीन की पहचान किस आधार पर हुई?
बैनामे से पहले राजस्व रिकॉर्ड किसने देखा?
₹1.45 करोड़ का भुगतान किन परिस्थितियों में हुआ?
और मौके पर खसरा 213 के पट्टेदार का निर्माण किस भूमि पर था?
इन सवालों के जवाब ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।
FIR के मुताबिक शिकायतकर्ता ने इससे पहले 20 जून 2026 को थाना जैत में शिकायत देने की बात कही थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उस समय मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। बाद में 16 सितंबर 2026 को FIR दर्ज हुई और जांच प्रशांत शर्मा, उपनिरीक्षक/अवर निरीक्षक को सौंपी गई।
जमीन के आसमान छूते दामों के बीच बड़ा सवाल
वृंदावन और आसपास के क्षेत्र में जमीन के बढ़ते मूल्य के बीच यह मामला सिर्फ दो पक्षों का विवाद नहीं, बल्कि जमीन खरीदने से पहले राजस्व रिकॉर्ड, मौके की पैमाइश और वास्तविक कब्जे की जांच की व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है।
1432 गज जमीन के लिए ₹1.45 करोड़ का भुगतान हुआ—यह FIR में शिकायतकर्ता का कथन है। अब असली सवाल यह है कि जिस जमीन का सौदा खसरा 204 बताकर हुआ, उसकी वास्तविक पहचान राजस्व रिकॉर्ड और मौके के नक्शे में क्या निकलती है?
जवाब पुलिस जांच, राजस्व अभिलेख और विधिवत सीमांकन से ही सामने आएगा।
कानूनी स्थिति यह है कि FIR, शिकायत में वर्णित घटनाक्रम और न्यायालय में विचाराधीन उपलब्ध दस्तावेज/नक्शे पर आधारित है। FIR में लगाए गए आरोप अभी न्यायालय द्वारा सिद्ध नहीं हुए हैं।









