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राषन के चावल के ट्क के पीछे भागती मथुरा की पत्रकारिता, पत्रकारिता का गिरता स्तर, वरिष्ठ व ईमानदार पत्रकारों की खामोषी चिंता का सबब।

राषन के चावल के ट्क के पीछे भागती मथुरा की पत्रकारिता, पत्रकारिता का गिरता स्तर, वरिष्ठ व ईमानदार पत्रकारों की खामोषी चिंता का सबब।

मथुरा। भ्रष्टाचार व दलाली के दलदल में डूबे मीडिया गेंग के कारनामें आये दिन सुर्खीयों मंे छाये रहते है। जनपद में कहां क्या गलत काम हो रहा हैै उसकी पूरी जानकारी इनके पास रहती है। कुछ की महीने दारी बंधी हुई है जो उनके घर पर ही पहुंच जाती है। कुछ को माफियांओं के घर से लानी पडती है। ओर कुछ पूरी रात जागकर मेहनत के बाद अपना हिस्सा ले पाते है। राषन माफिया, शराब माफिया, नषे का अवैध कारोबार करने वालें इनकी उंगलीयों पर होते है। किससे किसको कितना मिल रहा है यह भी इनको पूरी जानकारी होती है। इनका नेटवर्क केवल जनपद मथुरा में ही नही है। यह निकलटवर्ती जनपदों जैसे हाथरस, अलीगढ, फिरोजबाद तक के षिकार को ये जाने नही देते।
हाल ही का वाक्या जनपद हाथरस के सहपउ का है जहां मीडीया गेंग के आधा दर्जन से अधिक लोग राषन माफिया से वसूली करने पहुच गये। जिसमें से कुछ सीसीटीवी में कैद हो गयें कुछ दूर होने के कारण पर्दे के पीछे ही रह गयें।
मामला 13 जून की रात्रि 10 बजें का जब है जब आधा दर्जन से अधिक कथित पत्रकार राषन माफिया गौरव के यहंा पहुंचे।
प्राप्त जानकारी के अनुसार एक दिन पहले इन पत्रकारों को 8 हजार रूपये दे दिये गये थे। फिर भी उसी पत्रकार ने अन्य लोगों को घर तक भेज दिया था। कथित पत्रकारों ने गौरव के बारें मेें पूछा ही था कि घर की महिलायें पत्रकारों का नाम सुनते ही बिफर पडी व सीधें कहा कि इतना पैसा कहां से लायें कोई 8 हजार मांगता है कोई दस हजार। 100 डायल पर काॅल करने की धमकी देने पर पत्रकार तुरन्त वहां से खिसकने लगें। राषन माफिया इस बात से खासा नाराज हो गया कि महीनेदारी देने के बाबजूद पत्रकारों की हिम्मत घर में घुसने की कैसे हो गयी। बात तू तडाक से गाली गलोज में बदल गयी ओर राषन माफिया कथित पत्रकारों से हुई बातचीत की आॅडियों लेकर थाने पहुंच गया। 13 जून की रात्रि में ही आधा दर्जन पत्रकारों के खिलाफ प्रार्थना पत्र दे दिया गया। जिसमें आज 15 जून कों मुकदमा पंजीकृत हो गया।
ये तो सिर्फ एक वाक्या मात्र है। जो कानून की जद में आ गया है। जनपद मथुरा में पांच से अधिक ऐसे बडे नाम है जो राषन की कालाबाजारी में लिप्त है व पत्रकारों की संख्या सैकडोें मेें है
मिली जानकारी पर यदि यकीन करें तो सरकारी राषन को डकारने का बहुत बडा जाल है। सब दलाल पत्रकारों को उसमें से हिस्सा मिलता है। कुछ पत्रकारों की महीनेदारी उनकें घर पहुंच जाती है। कुछ पत्रकार माफियाओं के घर से लेकर आते है। जिनकी सेंटिग नही हो पाती या जिन्हे मोटी रकम चहिये होती है। वे राषन माफिया की गाडी कों निकलते हुए पकड लेते है फिर होता है मोटा सौदा। पीडित के बताये अनुसार सहपउ मामले में जितेन्द्र शर्मा, बीडी षर्मा, दीन दयाल शर्मा व लाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया है।
अब यहां कुछ पत्रकार नाराज हो जायेंगें ओर कहेंगे कि कुछ दलाल पत्रकारों के कारण पूरी मथुरा की पत्रकारिता को राषन के ट्क के पीछे दौडते हुए दिखाया जा रहा है।
ऐसे पत्रकारों की संख्या एक दो नही सैकडों में है। ईमानदार और वरिष्ठ पत्रकारों की खामोषी इनके होंसलों को बल प्रदान करती है। पत्रकारिता में आयी दलाली ने ही अयोग्य पत्रकारों के प्रवेष का रास्ता खोला है। वरिष्ठ पत्रकार भी अपने आॅफिस में से निकलकर पत्रकारिता नही करना चाहते ओर ऐसे लोगो से ही खबर लेने लगते है इस वजह से गाहे वगाहे इनकी मदद भी करनी पडती है। ओर फिर बन जाते है ये वरिष्ठ पत्रकार। आखिर पत्रकारिता के इस गिरते हुए स्तर के लिये कौन जिम्मेदार है? यह अपने आप में एक यक्ष प्रष्न है।

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